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Trimbak Mukut

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"One of the divine Jyotiringla among Twelve Jyotrinlingas in India"
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कालसर्प दोष के लक्षण, प्रकार, विधि और फायदे

कालसर्प दोष के लक्षण

 

कालसर्प योग दोष क्या होता है?

राहु और केतु के कारण जन्मकुंडली में आनेवाले दोष को कालसर्प दोष कहा जाता है। व्यक्ति के जन्म के समय पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार राहु और केतु का जन्मकुंडली में स्थान निश्चित होता है, जिसके कारण जीवनमे अनेक कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है। इस योग को कालसर्प कहा जाता है क्यूंकि काल यानी यम एवं सर्प यानी सर्प देवता। राहु ग्रह के जन्म का नक्षत्र भरणी है जिसके देवता यम है जिन्हे काल भी कहा जाता है, तथा केतु ग्रह के जन्म नक्षत्र आश्लेषा है  जिनके देवता सर्प है। इस योग में राहु का मुख सर्प हो जाता है तथा सर्प का शरीर केतु हो जाता है। जन्मकुंडली में जब यह मुख और शरीर एक दूसरे के सामने आ जाते है तब बाकी ग्रह १ से ७ इन स्थानों में एकत्रित हो जताए है जिसे कालसर्प योग कहा जाता है। इस योग को दोष इसीलिए कहा जाता है जैसे साप कुंडली मारकर जमीनपर बैठता है ठीक वैसेही राहु और केतु कुंडली मारकर जन्मकुंडली में बैठ जाते हैं।

कालसर्प योग के लक्षण 

  • स्वप्न में मरे हुए परिजन दिखना। 
  • व्यापार पर बुरा असर होना।      
  • ब्लडप्रेशर जैसी रक्त से संबधित बीमारियां, गुप्त शत्रु से परेशानी होना।     
  • सोते समय कोई गला दबा रहा हो ऐसा प्रतीत होना। 
  • स्वप्न में खुदके घर पर परछाई दिखना। 
  • नींद में शरीर पर साँप रेंगता होने का अहसास होना। 
  • जीवनसाथी से विवाद होना।
  • रात में बार-बार नींद का खुलना। 
  • स्वप्न में नदी या समुद्र दिखना। 
  • पिता और पुत्र के बीच विवाद होना।  
  • स्वप्न में हमेशा लड़ाई झगड़ा होते दिखना। 
  • स्वप्न में साँप पीछे पड़ा है ऐसा दिखना। 
  • मानसिक परेशानी, सिरदर्द, त्वचारोग होना।
  •  कालसर्प योग दोष पूजा नियम 
  • यह पूजा करने से एक दिन पहले त्र्यंबकेश्वर में आना जरुरी है।
  • यह पूजा अकेला व्यक्ति भी कर सकता है, किन्तु गर्भवती महिला इसे अकेले नहीं कर सकती। 
  • इस योग से ग्रसित व्यक्ति बालक होने पर उसके माता-पिता इस पूजा को एक साथ कर सकते है। 
  • पवित्र कुशावर्त तीर्थ पर जाकर स्नान करके पूजा करने के लिए नए वस्त्र धारण करना आवश्यक है।  
  • इस पूजा को करने के लिए पुरुष धोती, कुडता एवं महिला सफेद साडी पहनती है। 

कालसर्प दोष पूजा विधि

  • प्रथम श्री गणेश भगवान का पूजन होता है।  
  • इसके पश्चात नागमंडल पूजा की जाती है, जिसमें १२ नागमूर्ति होती है।  
  • इन १२ नागमूर्तियोंमें १० मुर्तिया चांदी से निर्मित तथा १ सोने से एवं एक नागमूर्ति ताम्बे की होना अनिवार्य है।  
  • फिर हर नाग को नागमंडल में बिठाया जाता है जिसे लिंगतोभद्रमण्डल भी कहा जाता है।  
  • लिंगतोभद्रमण्डल की विधिवत प्राणप्रतिष्ठा करके षोडशोपचार पूजन किया जाता है।  
  • इसके पश्चात नाग मूर्ति का विसर्जन किया जाता है।  
  • राहु-केतु, सर्पमंत्र, सर्पसूक्त, मनसा देवी मन्त्र एवं महामृत्युंजय मंत्र की माला से जाप करके मन्त्रोद्वारा हवनादि किया जाता है।  
  • हवाना के बाद जिस प्रतिमा से कालसर्प का दोष दूर होता है उसपर अभिषेक किया जाता है, और उसे पवित्र जलाशय या नदीमे विसर्जित किया जाता है।
  • तीर्थ में स्नान करके, पूजा के दौरान धारण किए हुए वस्त्र वहीं छोड़ दिए जाते है तथा साथ में लाए हुए नए वस्त्र धारण किये जाते है।   
  • इसके पश्चात ताम्रनिर्मित सर्प मूर्ति को ज्योतिर्लिंगको अर्पण करके, सुवर्ण नाग की प्रतिमा मुख्य गुरूजी एवं अन्य नागमूर्तियाँ उनके सहयोगी गुरूजी को दिए जाते है।  
  • अंतिम विधि श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंगके दर्शन एवं पूजन करके सम्पन्न होती है।

कालसर्प योग के प्रकार 

कालसर्प योग में जन्मे व्यक्ति के जन्मकुंडली में कोई एक प्रकार का योग दिखता है जिसे आगे दर्शाया है - 

१) अनंत कालसर्प योग - प्रथम स्थान पर राहु एवं सातवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “अनंत कालसर्प योग” बनता है। 

२) कुलिक कालसर्प योग - दूसरे स्थान पर राहु एवं आठवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “कुलिक कालसर्प योग” बनता है। 

३) वासुकी कालसर्प योग - तीसरे स्थान पर राहु एवं नौवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “वासुकी कालसर्प योग” बनता है। 

४) शंखपाल कालसर्प योग - चौथे स्थान पर राहु एवं दसवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “शंखपाल कालसर्प योग” बनता है। 

५) पद्म कालसर्प योग - पांचवे स्थान पर राहु एवं ग्यारहवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “पद्म कालसर्प योग” बनता है।

६) महापद्म कालसर्प योग - छठे स्थान पर राहु एवं बारहवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “पद्म कालसर्प योग” बनता है।

७) तक्षक कालसर्प योग - सातवें स्थान पर राहु एवं बारहवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “तक्षक कालसर्प योग” बनता है।

८) कर्कोटक कालसर्प योग - आठवें स्थान पर राहु एवं दूसरे स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “कर्कोटक कालसर्प योग” बनता है।

९) शंखचूड कालसर्प योग - नौवें स्थान पर राहु एवं तीसरे स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “शंखचूड कालसर्प योग” बनता है।

१०) घातक कालसर्प योग - दसवें स्थान पर राहु एवं चौथे स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “घातक कालसर्प योग” बनता है।

११) विषधर कालसर्प योग - ग्यारहवें स्थान पर राहु एवं पांचवे स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “विषधर कालसर्प योग” बनता है।

१२) शेषनाग कालसर्प योग - बारहवें स्थान पर राहु एवं छठे स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “विषधर कालसर्प योग” बनता है।

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जानिए काल सर्प दोष निवारण पूजा त्रिम्बकेश्वर

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कालसर्प योग दोष पूजा फायदे 

  • नौकरीमे शोहरत और ऊँचे पदका लाभ होना। 
  • व्यापार में लाभ होना। 
  • पति पत्नी में मतभेद मिट जाना। 
  • मित्रों से लाभ होना।  
  • आरोग्य में लाभ होना।  
  • परिवार में शान्ति आना।  
  • उत्तम संतान की प्राप्ति होना।  
  • सामजिक छवि में सुधार होना।  
  • कालसर्प योग दोष पूजा दक्षिणा
  • पूजा में उपयोग आनेवाली सामग्री पर दक्षिणा आधारित होती है।

त्र्यंबकेश्वर में कालसर्प पूजा पंडित 

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में पूजा करनेवाले विशेष पण्डितजी होते है, जिन्हे ताम्रपत्रधारी गुरूजी कहा जाता है। केवल इन्हें यह विशेष पूजा सम्पन्न करनेका अधिकार प्राप्त है। त्र्यंबकेश्वर में आधिकारिक तौर पर पुरोहित संघ संस्था द्वारा इन्हे नियुक्त किया जाता है। कालसर्प योग दोष पूजा त्र्यंबकेश्वर स्थित ताम्रपत्रधारी गुरूजी के निवासस्थान पर की जाती है। जब आप त्र्यंबकेश्वर में पूजा कराने आए तब ताम्रपत्रधारी गुरूजी की पहचान करके पूजा करे अन्यथा पूजा का लाभ मिलने में कठिनाई होने की संभावना है। 

11 Jun '21 Friday

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