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Trimbak Mukut

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"One of the divine Jyotiringla among Twelve Jyotrinlingas in India"
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रुद्राभिषेक पूजा का विधि, मुहूर्त, सामग्री और फायदे

रुद्राभिषेक पूजा 

रूद्र अभिषेक कैसे होता है ? रुद्राभिषेक भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए एक महत्वपूर्ण पूजा है। इस पूजा को भक्त अपने घर में या शिवालय (शिव मंदिर) की जगह करते है। सावन में रूद्र अभिषेक का महत्व अधिक होता है। सावन मास में गंगाजल एवं दूध से रुद्राभिषेक करना भगवान शंकर को अतिप्रिय है। इसके पीछे विशेष कारण है, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भोलेनाथ से विवाह करने के लिए सावन मास में अतिकठोर तपस्या की थी जिसके फल स्वरूप भोलेनाथ ने माता पार्वती से विवाह करने के लिए वचन दिया। भोलेनाथ ने माता पार्वती को अन्य वचन भी दिया जिसमे उन्होंने कहा की, “जो भक्त सावन महीने में सच्चे भाव से शिवलिंग पर रुद्राभिषेक करेगा उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी।” इसीलिए अविवाहित स्त्री एवं पुरुष मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए सावन महीने में शिवालय में जाकर रुद्राभिषेक करते है।

फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि त्यौहार के रूप में मनाया है। शिवमहापुराण के अनुसार इस दिन माता पार्वती और भगवान भोलेनाथ का विवाह हुआ था इसीलिए इस दिन जो भक्त व्रत-उपवास रखकर शिवमंदिर में जाकर रुद्राभिषेक करता है, उस पर भोलेनाथ की कृपा आजीवन बनी रहती है। महाराष्ट्र में नासिक शहर में १२ ज्योतिर्लिंगोमे से अतिपवित्र माना जानेवाला श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग है। इस ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह है की यहाँ महादेव शंकर, ब्रह्मा एवं विष्णु एकत्रित रूप में विराजमान है। इस ज्योतिर्लिंगमे तीन कपार है जहाँ त्रिदेव ज्योतिर्लिंग रूप में तथा माँ गंगा जल रूप में विराजमान है। ऐसी मान्यता है के ज्योतिर्लिंग के पावन मंदिर में रुद्राभिषेक पूजा कराने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है एवं पापोंसे तुरंत छुटकारा मिलता है।

रुद्राभिषेक पूजा विधि 

  • रुद्राभिषेक पूजा में बारी-बारीसे जल, दूध, दही, शक़्कर एवं शहद से अभिषेक किया जाता है।
  • प्राचीन रुद्राभिषेक विधि अनुसार शुक्ल यजुर्वेद में रुद्राभिषेक पूजा की विधि का विस्तृत वर्णन किया गया है।
  • रुद्राभिषेक विधि में कुल मिलाकर १० पाठ होते है, लेकिन इनमे केवल ८ पाठ ही किये जाते है, बचे २ पाठ शान्ति अध्याय एवं स्वस्ति प्रार्थनाध्याय है।
  • ८ अध्याय मिलाकर अष्टाध्याय का पाठ किया जाता है - जिसे रूपक एवं षडंग पाठ कहा जाता है।
  • सम्पूर्ण रुद्राष्टाध्याय का वाचन करते समय आठवाँ एवं पाँचवा अध्याय पुनरावृति में नहीं लिया जाता, जिसे नमक-चमक से अभिषेक करना कहा जाता है।
  • रुद्राष्टाध्याय पाठ सम्पूर्ण होने पर शान्तिपाठ एवं स्वस्ति प्रार्थनाध्याय लिया जाता है, जिसके बाद पण्डितजी को दान-दक्षिणा देकर रुद्राभिषेक सम्पन्न होता है।

लघुरूद्राभिषेक पूजा क्या होती है?

रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करते समय पाँच तथा आठवाँ अध्याय को “नमक चमक पाठ” कहा जाता है। नमक चमक पाठ के ११ आवर्तन पुरे होने पर इसे “एकादशिनि रुद्री” पाठ कहा जाता है तथा एकादशिनी रुद्री पाठ के ११ आवर्तन पूर्ण होने पर इसे “लघु रुद्री” पाठ कहा जाता है। प्राचीन मान्यता के अनुसार लघुरूद्री या “लघुरूद्राभिषेक”| कराने पर साधक को मोक्षप्राप्ति होती है।

रुद्राभिषेक पूजा सामग्री  

  • पंचामृत जिसमे दूध, शुद्ध देसी घी, दही, शक़्कर एवं  शहद का उपयोग होता है। 
  • बेल पत्र (बेल के पत्ते), सुगन्धि फूल, गुलाबजल
  • अष्ट गंध, यज्ञोपवीत गंगाजल, रुद्राक्ष भस्म, नैवेद्य के लिए मिठाई
  • उपलब्ध होने पर गन्ने का रस भी अभिषेक के लिए उपयोग होता है। 
  • नारियल पानी एवं चावल (अक्षता) भी रुद्राभिषेक में विशेष माने जाते है।
  • ऋतु के अनुसार जो भी फल उपलब्ध है वो रुद्राभिषेक में समर्पित किये जाते है।

रुद्राभिषेक के फायदे 

  • इस पूजा के प्रभाव से बिगड़े कार्य बन जाते है।
  • जीवनमे सफलता मिलती है। 
  • परिवार को सुख-शांति की प्राप्ति होती है। 
  • व्यापार में वृद्धि एवं आर्थिक समस्या का हल होता है। 
  • स्वास्थ से जुडी परेशानियाँ दूर होती है। 
  • आपसी मनमुटाव मिट जाता है। 
  • कुंडली में विपरीत ग्रह शांत हो जाते है, विशेष तौर पर मंगल ग्रह की शान्ति का उपाय रूद्राभिषेक से तुरंत संभव होता है।   
  • नौकरी में ऊँचे पद की प्राप्ति होती है।  
  • भविष्य में आने वाले संकट मिट जाते है।  
  • ग्रहबल बढ़ता है एवं पितृदोष नष्ट होता है।   
  • पुष्य, आश्लेषा एवं पुनर्वसु नक्षत्रोंका जीवन पर होनेवाला नकारात्मक प्रभाव नष्ट हो जाता है।

रुद्राभिषेक के मुहूर्त

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में प्राचीन समय से आधिकारिक तौर पर विशेष पण्डितजी द्वारा पूजा की जाती है, जिन्हे ताम्रपत्रधारी पण्डितजी कहा जाता है। रुद्राभिषेक पूजा करने के लिए उचित समय एवं मुहूर्त की जानकारी त्र्यंबकेश्वर पण्डितजी बताते है। इस पूजा के नियम आदि मालुम करने के, मुहूर्त देखकर आप त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में रुद्राभिषेक पूजा कर सकते है|

पुरोहित संघ पण्डितजी आप को त्र्यंबकेश्वर में की जानेवाली सभी धार्मिक पुजाओंके बारेमें मार्गदर्शन प्रदान करते है। आपकी आवश्यकता के अनुसार पुरोहित संघ गुरुजीसे मार्गदर्शन पाकर पूजा के एक दिन पहले आपको त्र्यंबकेश्वर में आना जरुरी है। आपका मार्गदर्शन हो इस उद्देश्य से पुरोहित संघ संस्था द्वारा अधिकृत वेबसाईट बनाई गयी है, कृपया इसका लाभ उठाए।

 

16 Jun '21 Wednesday

What is Tripindi Shradha and its Benefits?

Tripindi Shradha Benefits

 

In this blog, we are discussing Tripindi Shradha Benefits. Tripindi Shradha means Pinddaan of our forefathers of the last three generations. It is Pitru Dosh Nivaran Puja. The Pind is made with a mixture of Rice, Seasome seeds, Barley flour, and Ghee. If anyone in the family from the last three generations has passed away at a very young age or old age for those souls, we perform Tripindi Shradha. It is believed that departed souls of ancestors who have an incidental death of any kind, be it by a car accident, bitten by a snake or poisonous snake and who had died with unfulfilled desires, causes problems to next generation as Shardha is performed to offer food and water to the Pitru Devtas. Tripindi Shardha Puja is a ceremony of offering food and water to the souls of departed ancestors. This is known as Tripindhi Shradha Puja Vidhi.

Most people have an idea about Shradha, which means satisfying the last three generations. But this is not only related to the last three generations but also related to any soul who is not satisfied in his life and passed away. Such a soul troubles future generations. To calm such a soul, we perform Tripindi Shradha Puja.

As per the ancient scripture, It is suggested that this rite is performed only at the tirtha kshetra. Trimbakeshwar Temple has great importance in performing Tripindi Shardha Puja. Trimbakeshwar temple is an ancient temple in Trimbak village, Nashik, Maharashtra.

Tripindi Shardha Mantra:

“ये न पितुः पितरो ये पितामहा |

य आविविशुरुर्वन्तरिक्षम् ||

य आक्षियन्ति पृथिवीमुत द्यां |

तेभ्यः पितृभ्यो नमसा विधेम ॥”

Meaning: The Atharva Veda states, We satisfy the ancestors of three generations, namely, Pita(father), Pitamah (grandfather), and Pra-Pitamah (forefathers).

Tripindi Shradha Benefits:

  • The main benefit of Tripindi Shradha is; it removes the Pitru Dosha.
  • It gives salvation to the discontent sole of ancestors, which in turn give us blessings from them.
  • It will give happiness and peace to person and family.
  • Person and family will be blessed with good health and wealth.
  • Performing the Tripindi Shardha puja brings harmony to family relation.
  • It benefits with financial flow and stability. 
  • A person can observe a good marriage proposal after performing Tripindi Shardha.
  • It protects against unnatural and early deaths in the family.
  • The person will be successful in life and will attain salvation after his death. 
  • While another Shradha is performed for a specific individual or are performed particularly for the last three generations, but Tripindi Shradha is performed for ancestors earlier than three generations. 

Important Note: Puja takes 2/3 hours to complete. Devotee Should reach Trimbakeshwar one day before the puja. One should have a bath in the holy water of Kushavarta and Observe a fast.

Book Tripindi Shradha Puja Online

11 Jun '21 Friday

Benefits of Chanting Mahamrityunjay Mantra 108 Times

Mahamrityunjay mantra Benefits

 

In this blog, we are discussing Mahamrityunjay Mantra Benefits. Mahamrityunjay mantra is the powerful mantra of Lord Shiv. There are so many benefits of Chanting Mahahrityunjay Mantra Jaap. It is also called as Om Tryambakam mantra. Maha means great, and Trambakam means One who has three eyes. Lord Shiva is the only one who has it. The meaning of the mantra is to worship the three-eyed God-Shiva; who nourishes all living beings. Mantra protects against disasters and prevents premature death. Apart from this, all wishes will get fulfilled by chanting the Mahamrityunjay mantra.

Effects of Mantra will be more powerful if we chant this mantra early morning at 4 am.

It is prescribed to chant the Mahamrityunjay Mantra 108 times. Many devotees used Rudrash rosary, which consists of 108 beds that are used to count the number of chants of these powerful mantras. Number 108 also has great significance. 1 means “Oneness”, 0 means nothingness, and 8 means everything. Together they depict the ultimate reality of the universe that it is one, empty and infinite, all at once. Almost all mantras are chanted 108 times. By reciting this mantra 108 times daily with Rudrash rosary, the fear of untimely death goes away.

While there are so many Shivaj poojas, ways to worship Lord Shiva, that are listed in the Vedas but Chanting Mahamrityunjay Mantra 108 times considered as the most powerful ways to gratify the highest divine power, i.e. Power of Lord Shiva.

Mahamrityunjay Mantra Benefits are listed below

  • It most powerful Lord Shivas Mantra.
  • It is believed that if we chant this mantra religiously, then Lord Shiva crates one protective shield around us that protects us from sudden death.
  • Chanting Of Mahamrtyunjay Mantra destroys doshas like Manglik Dosh, Nightmare, Kaal Sarp Dosh, Progeny and many defects of our horoscope.
  • Mantra gives you good health and wealth and long life.
  • Mahamyunjay Matra is Lifesaving Mantra. Effects of the mantra will be more powerful if we chant this mantra early morning at 4 am.
  • It helps the human body to connect with its inner self.
  • It brings happiness to your marriage and your family life. 
  • Chanting mantras in od numbers will remove the Kundali dosh.
  • This mantra is also beneficial for those who are bad sleepers are witness bad slippers. Chanting this mantra before the bed or at the beginning of the day gives you peace and helps them have an undisturbed sleep. 

I hope this blog will help to Know the Benefits of Chanting Mahamrityunjay Mantra Jaap 108 times.

Also, Know about Lord Shivas Rudra Abhishek at Trimbakeshwar.

11 Jun '21 Friday

कालसर्प दोष के लक्षण, प्रकार, विधि और फायदे

कालसर्प दोष के लक्षण

 

कालसर्प योग दोष क्या होता है?

राहु और केतु के कारण जन्मकुंडली में आनेवाले दोष को कालसर्प दोष कहा जाता है। व्यक्ति के जन्म के समय पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार राहु और केतु का जन्मकुंडली में स्थान निश्चित होता है, जिसके कारण जीवनमे अनेक कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है। इस योग को कालसर्प कहा जाता है क्यूंकि काल यानी यम एवं सर्प यानी सर्प देवता। राहु ग्रह के जन्म का नक्षत्र भरणी है जिसके देवता यम है जिन्हे काल भी कहा जाता है, तथा केतु ग्रह के जन्म नक्षत्र आश्लेषा है  जिनके देवता सर्प है। इस योग में राहु का मुख सर्प हो जाता है तथा सर्प का शरीर केतु हो जाता है। जन्मकुंडली में जब यह मुख और शरीर एक दूसरे के सामने आ जाते है तब बाकी ग्रह १ से ७ इन स्थानों में एकत्रित हो जताए है जिसे कालसर्प योग कहा जाता है। इस योग को दोष इसीलिए कहा जाता है जैसे साप कुंडली मारकर जमीनपर बैठता है ठीक वैसेही राहु और केतु कुंडली मारकर जन्मकुंडली में बैठ जाते हैं।

कालसर्प योग के लक्षण 

  • स्वप्न में मरे हुए परिजन दिखना। 
  • व्यापार पर बुरा असर होना।      
  • ब्लडप्रेशर जैसी रक्त से संबधित बीमारियां, गुप्त शत्रु से परेशानी होना।     
  • सोते समय कोई गला दबा रहा हो ऐसा प्रतीत होना। 
  • स्वप्न में खुदके घर पर परछाई दिखना। 
  • नींद में शरीर पर साँप रेंगता होने का अहसास होना। 
  • जीवनसाथी से विवाद होना।
  • रात में बार-बार नींद का खुलना। 
  • स्वप्न में नदी या समुद्र दिखना। 
  • पिता और पुत्र के बीच विवाद होना।  
  • स्वप्न में हमेशा लड़ाई झगड़ा होते दिखना। 
  • स्वप्न में साँप पीछे पड़ा है ऐसा दिखना। 
  • मानसिक परेशानी, सिरदर्द, त्वचारोग होना।
  •  कालसर्प योग दोष पूजा नियम 
  • यह पूजा करने से एक दिन पहले त्र्यंबकेश्वर में आना जरुरी है।
  • यह पूजा अकेला व्यक्ति भी कर सकता है, किन्तु गर्भवती महिला इसे अकेले नहीं कर सकती। 
  • इस योग से ग्रसित व्यक्ति बालक होने पर उसके माता-पिता इस पूजा को एक साथ कर सकते है। 
  • पवित्र कुशावर्त तीर्थ पर जाकर स्नान करके पूजा करने के लिए नए वस्त्र धारण करना आवश्यक है।  
  • इस पूजा को करने के लिए पुरुष धोती, कुडता एवं महिला सफेद साडी पहनती है। 

कालसर्प दोष पूजा विधि

  • प्रथम श्री गणेश भगवान का पूजन होता है।  
  • इसके पश्चात नागमंडल पूजा की जाती है, जिसमें १२ नागमूर्ति होती है।  
  • इन १२ नागमूर्तियोंमें १० मुर्तिया चांदी से निर्मित तथा १ सोने से एवं एक नागमूर्ति ताम्बे की होना अनिवार्य है।  
  • फिर हर नाग को नागमंडल में बिठाया जाता है जिसे लिंगतोभद्रमण्डल भी कहा जाता है।  
  • लिंगतोभद्रमण्डल की विधिवत प्राणप्रतिष्ठा करके षोडशोपचार पूजन किया जाता है।  
  • इसके पश्चात नाग मूर्ति का विसर्जन किया जाता है।  
  • राहु-केतु, सर्पमंत्र, सर्पसूक्त, मनसा देवी मन्त्र एवं महामृत्युंजय मंत्र की माला से जाप करके मन्त्रोद्वारा हवनादि किया जाता है।  
  • हवाना के बाद जिस प्रतिमा से कालसर्प का दोष दूर होता है उसपर अभिषेक किया जाता है, और उसे पवित्र जलाशय या नदीमे विसर्जित किया जाता है।
  • तीर्थ में स्नान करके, पूजा के दौरान धारण किए हुए वस्त्र वहीं छोड़ दिए जाते है तथा साथ में लाए हुए नए वस्त्र धारण किये जाते है।   
  • इसके पश्चात ताम्रनिर्मित सर्प मूर्ति को ज्योतिर्लिंगको अर्पण करके, सुवर्ण नाग की प्रतिमा मुख्य गुरूजी एवं अन्य नागमूर्तियाँ उनके सहयोगी गुरूजी को दिए जाते है।  
  • अंतिम विधि श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंगके दर्शन एवं पूजन करके सम्पन्न होती है।

कालसर्प योग के प्रकार 

कालसर्प योग में जन्मे व्यक्ति के जन्मकुंडली में कोई एक प्रकार का योग दिखता है जिसे आगे दर्शाया है - 

१) अनंत कालसर्प योग - प्रथम स्थान पर राहु एवं सातवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “अनंत कालसर्प योग” बनता है। 

२) कुलिक कालसर्प योग - दूसरे स्थान पर राहु एवं आठवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “कुलिक कालसर्प योग” बनता है। 

३) वासुकी कालसर्प योग - तीसरे स्थान पर राहु एवं नौवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “वासुकी कालसर्प योग” बनता है। 

४) शंखपाल कालसर्प योग - चौथे स्थान पर राहु एवं दसवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “शंखपाल कालसर्प योग” बनता है। 

५) पद्म कालसर्प योग - पांचवे स्थान पर राहु एवं ग्यारहवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “पद्म कालसर्प योग” बनता है।

६) महापद्म कालसर्प योग - छठे स्थान पर राहु एवं बारहवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “पद्म कालसर्प योग” बनता है।

७) तक्षक कालसर्प योग - सातवें स्थान पर राहु एवं बारहवें स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “तक्षक कालसर्प योग” बनता है।

८) कर्कोटक कालसर्प योग - आठवें स्थान पर राहु एवं दूसरे स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “कर्कोटक कालसर्प योग” बनता है।

९) शंखचूड कालसर्प योग - नौवें स्थान पर राहु एवं तीसरे स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “शंखचूड कालसर्प योग” बनता है।

१०) घातक कालसर्प योग - दसवें स्थान पर राहु एवं चौथे स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “घातक कालसर्प योग” बनता है।

११) विषधर कालसर्प योग - ग्यारहवें स्थान पर राहु एवं पांचवे स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “विषधर कालसर्प योग” बनता है।

१२) शेषनाग कालसर्प योग - बारहवें स्थान पर राहु एवं छठे स्थान पर केतु और बाकी ग्रह इन दोनों के बीच होने पर “विषधर कालसर्प योग” बनता है।

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जानिए काल सर्प दोष निवारण पूजा त्रिम्बकेश्वर

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कालसर्प योग दोष पूजा फायदे 

  • नौकरीमे शोहरत और ऊँचे पदका लाभ होना। 
  • व्यापार में लाभ होना। 
  • पति पत्नी में मतभेद मिट जाना। 
  • मित्रों से लाभ होना।  
  • आरोग्य में लाभ होना।  
  • परिवार में शान्ति आना।  
  • उत्तम संतान की प्राप्ति होना।  
  • सामजिक छवि में सुधार होना।  
  • कालसर्प योग दोष पूजा दक्षिणा
  • पूजा में उपयोग आनेवाली सामग्री पर दक्षिणा आधारित होती है।

त्र्यंबकेश्वर में कालसर्प पूजा पंडित 

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में पूजा करनेवाले विशेष पण्डितजी होते है, जिन्हे ताम्रपत्रधारी गुरूजी कहा जाता है। केवल इन्हें यह विशेष पूजा सम्पन्न करनेका अधिकार प्राप्त है। त्र्यंबकेश्वर में आधिकारिक तौर पर पुरोहित संघ संस्था द्वारा इन्हे नियुक्त किया जाता है। कालसर्प योग दोष पूजा त्र्यंबकेश्वर स्थित ताम्रपत्रधारी गुरूजी के निवासस्थान पर की जाती है। जब आप त्र्यंबकेश्वर में पूजा कराने आए तब ताम्रपत्रधारी गुरूजी की पहचान करके पूजा करे अन्यथा पूजा का लाभ मिलने में कठिनाई होने की संभावना है। 

11 Jun '21 Friday

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा के विधि, सामग्री, मुहूर्त और फायदे

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा

 

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा क्या है? त्रिपिंडी मतलब ३ पिढियों का पिंडदान। त्रिपिंडी श्राद्ध, श्री त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र में कुशावर्त तीर्थ पर होनेवाली महत्वपूर्ण पूजा है। इस पूजा में तीन पीढ़ियों के पिंड सम्मिलित किए जाते है इसलिए इस पूजा को त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा कहा जाता है। पिता पहली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते है, दादाजी दूसरी पीढ़ी एवं परदादा (दादाजी के पिताजी) की पीढ़ी में जिन भी व्यक्तियों का विधिवत श्राद्ध नहीं होता उन्हें परलोक में स्थान नहीं प्राप्त होता। परिवार के सदस्य की अकस्मात मृत्यु होनेपर, अन्यथा किसी सदस्य की शादी के पहले मृत्यु होने पर उन्हें मोक्ष नहीं मिलता। ऐसे में मृत परिजन की आत्मा को शान्ति प्राप्त हो इस उद्देश्य से प्रथम वर्ष में वार्षिक श्राद्ध, दूसरे वर्ष एवं तीसरे वर्ष में सांवत्सरिक श्राद्ध और महालया श्राद्ध किया जाता है।  

ऐसे में जब इन तीन पीढ़ियों में मृत परिजन के पहले तीन वर्षोमें श्राद्ध विधि न किये हो तो उसकी आत्मा को पुनर्जन्म नहीं मिलता। वे वर्तमान पीढ़ी में जन्मे वंशजों को परेशान करते है। त्रिपिंडी श्राद्ध पूजाके प्रभाव से उनकी आत्मा को शान्ति प्राप्त होती है एवं वे पुनर्जन्म ले पाते है।  

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा के नियम

  • त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा करने से एक दिन पहले त्र्यंबकेश्वर आना आवश्यक है।
  • पुरुषोने पूजा के दिन सफेद कुरता एवं धोती पहनना जरुरी होता है एवं महिलाओंने सफेद साडी पहननी जरुरी है। काले वस्त्र पूजा में नहीं पहनना चाहिए।
  • पूजा के समय श्राद्धकर्ता केवल सात्विक भोजन यानी प्याज और लहसुन विरहित आहार करे।       

त्रिपिंडी श्राद्ध विधि 

  • त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा की शुरुआत करने से पहले भक्तों को त्र्यंबकेश्वर मंदिर के समीप कुशावर्त तीर्थ पर स्नान करना होता है जिसके पश्चात सफेद वस्त्र धारण करने होते है।
  • इस पूजा को विशेष पण्डितजी द्वारा किया जाता है जिन्हे ताम्रपत्रधारी पण्डितजी कहा जाता है।
  • पूजा के आरम्भ में श्राद्ध किया जाता है जिसमे पिंडदान करना होता है।
  • पिंडदान के लिए तीन पीढ़ियों के लिए पिंड बनाए जाते है, जिन पर चीनी, शहद एवं शुद्ध तूप अर्पित किया जाता है।
  • पिंड की पूजा करने के पश्चात श्री विष्णु पूजा तर्पण के माध्यम से की जाती है।
  • पूजा के बाद पण्डितजी को सोना, चाँदी, छाता, खडावा, कमंडलू,  पात्र इत्यादि वस्तुओंका दान दिया जाता है एवं दक्षिणा दी जाती है।

त्रिपिंडी श्राद्ध की सामग्री

  • तीन देवताओंकी सोना, चांदी तथा ताम्र से निर्मित प्रतिमा। 
  • पिंडदान के लिए काला तील, जौ, तथा चावल के बने पिंड।
  • ताम्र धातू से निर्मित ३ कलश, पुर्णपात्र, गंगाजल, गाय का दूध।
  • आसन, अगरबत्ती, रक्षा सूत्र, जनेऊ, रुद्राक्ष माला, फूल माला।
  • खीर, देसी घी, पंच रत्न, बर्फी, मिठाई, पंचमेवा, लड्डू, खोवा।
  • रुई बत्ती, माचिस, कपूर, अगरबती, घंटा, शंख, हवन पैकट।
  • पान के पत्ते, सुपारी, चावल, गेहूँ, हल्दी, सिंदूर, गुलाल। 
  • नारियल, लोटा (बर्तन), हल्दी पाउडर, कुंकुम, रोली, लौंग, उपला। 
  • मूंग, ऊड़द, शहद, चीनी, गुड़, दूध, ईलायची, केला, तुलसी का पत्ता।  
  • पिली सरसों, भगुनी, परात, चना दाल, काला उरद, सरसों का तेल।  

त्रिपिंडी श्राद्ध के फायदे

  • त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा कराने से पित्रोको शान्ति मिलती है तथा घर में किए जाने वाले मंगल कार्य जैसे नामकरण, शादीमें आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। 
  • पूजा के बाद हर काय में उन्नति, सफलता की नयी ऊंचाई, धन में वृद्धि होती है। 
  • नौकरी में प्रमोशन तथा व्यापार में फायदा होता है। 
  • समाज में खोया हुआ सम्मान प्राप्त होता है। 
  • घर-परिवार में आपसी रिश्तों में सुधार होता है। 
  • आरोग्य में अच्छा बदलाव होता है, प्रकृति स्थिर होती है।

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा की दक्षिणा

इस पूजा की दक्षिणा पूजा के दौरान उपयोग में आनेवाली सामग्री पर आधारित होती है। 

त्रिपिंडी श्राद्ध मुहूर्त 2021

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के पास कुशावर्त तीर्थ पर त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा की जाती है। त्रिपिंडी श्रद्धा पूजा के सही मुहूरत के लिए आपको त्रिम्बकेश्वर पंडितजी से संपर्क करना पड़ेगा। वो आपको आपकी कुंडली देख कर सही मुहूर्त बताएँगे।

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा करनेवाले पण्डितजी कौन है? 

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में पूजा करनेका विशेष अधिकार ताम्रपत्रधारी गुरूजी को ही प्राप्त होता है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर में परंपरागत पूजा चलती आ रही है जो ताम्रपत्रधारी गुरूजीद्वारा की जाती है, इनके पास ताम्बे की धातु से बना हुआ पेशवाकाल में दिया हुआ ताम्रपत्र है, जिसका संरक्षण आज पुरोहित संघ संस्था द्वारा किया जाता है। 

जो भक्त त्र्यंबकेश्वर में पूजा कराने इच्छुक है उन्हें सचेत किया जाता है की ताम्रपत्र एवं आधिकारिक प्रमाणपत्र की पहचान कराने पश्चात ही पूजा करे अन्यथा पूजा का लाभ मिलने में कठिनाई होने की संभावना को टाला नहीं जा सकता। 

पुरोहित संघ त्र्यंबकेश्वर के अधिकृत वेबसाइट के साथ आप ऑनलाइन पूजा भी बुक कर सकते हो।

ऑनलाइन त्र्यंबकेश्वर पूजा बुकिंग 

 

11 Jun '21 Friday

What is Kumbh Vivah and Manglik Dosh and its Types, Benefits, Vidhi and Cost

What is Kumbh Vivah

 

Are you facing a Delay in Marriage? Are you suffering from Mangalik Dosh? If you have Mangal in your Kundali / Birthchart and if the position of 7th house planets is not suitable, i.e., Mangalik Dosh. To remove Mangalik Dosh from individuals Kundali, we perform Kumbh Vivah. Kumbh Vivah is related to Mangalik Dosh.

What is Mangalik Dosh

If Mangal Grah placed at the position 1, 4, 7, 8, 12 then the sight of Mars falls on the seventh house of the horoscope. The seventh house in Janam Kundali is for the wife or Life partner. The status of the seventh house for marriage is accessed. In Kundali, if Mangal(Mars) is placed at 7th position, then it is considered the Mangalik Dosh. It is not good for marriage or married life. 

Mangalik Dosh is found in the horoscopes of forty percent of people, and after deep study of the potential of Mars in it, it is known whether there is Manglik Yoga or not. Those suffering from the evil effects of Mars (Mangal) to a great extent or whose first marriage is likely to break due to Manglik Dosh or any other yoga are advised to Kumbh Marriage or Kumbh Vivah.

Types of Manglik Dosha:

  • Anshik Manglik Dosh: 

It is also called Little Mangalik, generally ends after 18years of age. It doesn’t affect too much but is still resolved by Shanti Puja. After marriage, these doshas cause health issues, delivery problems, or clashes in one’s family.

  • Maha Manglik Dosh: 

This is very strong and negative Manglik Dosh. If an individual gets married to another with Manglik Dosh, it will indeed affect another person’s life. The perfect solution for Maha Manglik Dosh is Kumbh Vivah. This dosh can be finished by performing Kumbh Vivah. It may give success to both Bride and Groom even if one has Major Manglik Dosh. 

Is Manglik Dosha Permanent?

No, Mangalik Dosh is not permanent. Using Remedies like Kumbh Vivah can cure Mangalik Dosh Kundali permanently. Vedic Astrology believes that certain planets are malefic and that ill-placements (Wrong Position) can damage various aspects of life. Moreover, our Purohit Sangh Astrologer provides the best remedies to cure such Doshas.

What is Kumbh Vivah?

Kumbh combines two Sanskrit words; Kumbh means pot, and Vivah means Wedding/marriage in English. Kumbh Vivah is a marriage ceremony conducted with a Clay Pot filled with water. Kumbh Vivah is a puja performed when an individual has a Manglik Dosh or a Double Manglik Dosh in his Kundali/horoscope. Manglik Dosh is a kind error in Kundali / Patrika, which affects after the wedding.  

While the most commonly found hurdle for the delay in marriage because of Magal Dosh. I suggest you perform Kumbh Vivah Parihar Puja to Remove Mangal Dosh in Janma Kundli and Vivah Yog Balam Puja to remove the delay in marriage caused by other Graha. 

Simple, we can say Kumbh Vivah is a cancellation of 2nd Marriage Yog from your life. In Kumbh Vivah, a Girl marries the earthen pot with all Vedic rituals as if she is married to a boy. Also, after the marriage with Kumbh, the earthen pot should be smashed. 

Kumbh Vivah is only a typical wedding. For example, If a Girl has a Manglik Dosh, then she has to do this ritual. After performing the Kumbh Vivah puja, she can now marry the person and will not be having any further problems after the wedding. 

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Also, Read: Kumbh Vivah Performing Temples

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Effects of Manglik Dosh:

  • For Teenage or Young couple, Horrible fight with Girlfriend or Boyfriend.
  • In Love marriage or Arrange marriage, Misunderstanding between Bride and Groom families results in a breakup before Engagement or even after Engagement. 
  • For the Married couple who is having Mangal Dosh in his/her Kundali, Fights, Misunderstanding, can’t tolerate each other results in Divorce or Leading in 2nd marriage.
  • For the people searching or seeking for marriage facing issues like delay in marriage.

Who Can Perform Kumbh Vivah Puja:

Kumbh Vivah is related to Mangal Dosh or Mangalik Yog. Who is having Mangal Dosh in his Kundali/ Janam Patrika and facing issues like delay in marriage or too many clashes between Husband –Wife? People should perform Kumbh Vivah Puja.

Kumbh Vivah Benefits:

  • The main benefit of Kumbh is, A person can save their married life by performing Kumbh Vivah. 
  • An issue like delay in marriage also gets solved due to Kumbh Vivah.
  • Kumbh Vivah is the cancellation of the 2nd marriage Yog from your life. 

Kumbh Vivah Vidhi/Procedure:

Kumbh Vivah is a marriage ceremony conducted with a Clay Pot filled with water. Vidhi of Kumbh Vivah is the same as a real marriage. This is an unclosed marriage where only the Mother, Father, Brother, and Uncle ( Mother’s Brother ) attains the Kumbh Vivah. As per Kumbh Vivah muhurta, Guruji performs a puja, and this marriage will going to end soon.

If the person is advised doing Kumbh Vivah, they Should go to Trimbakeshwar Purohit Sangh Guruji and ask about Puja Procedure and Muhurtas. They have experienced Guruji (pandit) of Trimbakeshwar Temple. 

Kumbh Vivah Puja Cost:

Kumbh Vivah is not so expensive. All mantras and puja vidhi are similar to real marriage. The cost of Kumbh Vivah will depend on Guruji, or it will purely depend on an individual what Dakshina he gives to Guruji.  

Book Online Kumbh Vivah Puja:

Where is Kumbh Vivah performed? Any kind of Dosha Nivaran Puja's must not be performed at Home. Temples are the best place for such Dosh Nivaran Puja. 

Trimbakeshwar Temple is one of the best places to perform Kumbh Vivah. Purohit Sangh Guruji will make an easy and effective puja procedure for the devotees.

Purohit Sangh is an organization of approximately more than 300 Guruji. They will guide perform puja. They have well experienced Guruji of Trimabeskwar Temple. They are called Tamrapatradhari Guruji. “ Tamrapatradhari means they have a Birthright to perform all types of puja like Narayan Nagbali Puja, Kaal Sarp Dosh Puja, Tripidi Shradha Puja, Mahamrityunjay Jaap, Rudra Abhishek, and Kumbh Vivah. 

If you are planning to perform puja at Trimabkeshwar, Don’t Worry About Guruji!!! With the help of Purohit Sangh's Trimbakeshwar Temple Online Pooja Booking Portal,” you can book puja online. After puja booking, you can directly call them for puja dates, Samgri, and procedures.

10 Jun '21 Thursday

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